राजीव गांधी की यौम-ए-पैदाईश पर विशेष: राजीव गांधी………..! ‘तुमसा नही देखा”

शाहीन बनारसी

महज़ 40 साल की उम्र में देश के सबसे युवा प्रधानमन्त्री बनने वाले राजीव गांधी की शख्सियत आसमान पर चमकते उस चाँद की तरह है जो हमसे बहुत दूर है, मगर उसकी रौशनी हर रोज़ फैली दिखाई देती है। चौड़ा माथा, गहरी आँखे, लम्बा कद और होंठो पर वो धीमी सी मुस्कान संजोये देश की बाग़ डोर उस वक्त अपने हाथो में लेना जब उनकी माँ इंदिरा गांधी इस दुनिया-ए-फानी से रुखसत हो चुकी थी। खुद को उस दुःख के लम्हों में संभालते हुए देश को संभालना कोई आसान काम नही था मगर राजीव गांधी ने किया और अपने मुल्क हिन्दुस्तान के लिए जो सपने उन्होंने अपने आँखों में देखा था उसे पूरा भी किया।

एक बड़े महान साहित्यकार ने कहा था कि ‘यदि आपकी वरासत संघर्ष की हो तो इसे अपनी आने वाली पीढ़ी को जरुर देकर जाए’ गांधी परिवार के साथ भी कुछ ऐसा ही है। नाना नेहरु ने वतन से मुहब्बत का जज्बा तो माँ इंदिरा ने देश के लिए मर मिटने का जूनून और पिता फ़िरोज़ ने संघर्ष वरासत में राजीव को दिया था, जिसे अपने दिल में सजाये राजीव ने अपने मुल्क हिन्दुस्तान के लिए कुछ अलग करना चाह और वह अपने मकसद में कामयाब भी हुए। आज हमारे देश के पूर्व युवा प्रधानमंत्री राजीव गांधी की यौम-ए-पैदाइश है। आइये आपको उनके जिंदगी के संघर्षो और कुछ अहम पहलु से रूबरू कराते है।

भारत रत्न पूर्व युवा प्रधानमन्त्री राजीव गांधी का जन्म 20 अगस्त, 1944 को मुंबई में हुआ था। राजीव गांधी भारत के छठे प्रधानमंत्री थे। राजीव गांधी को राजनीति में कोई रूचि नहीं थी मगर अपने भाई संजय गांधी की मृत्यु के बाद माँ इंदिरा का सहयोग करने के लिए उन्होंने राजनीति में प्रवेश किया। देश के प्रख्यात राजनीतिक विरासत वाले परिवार में जन्में राजीव गांधी की नियती में ही राजनीति लिखी थी। वह अमेठी में लोकसभा चुनाव जीत कर सांसद बने और 1984 में अंगरक्षकों द्वारा मां इंदिरा गांधी की हत्या के बाद राजीव गांधी देश के छठें और सबसे युवा प्रधानमंत्री के तौर पर देश की कमान अपने हाथों में ली।

राजीव का अधिकांश बचपन राजनीतिक गलियारों में ही बिता था। राजीव ने नाना के काम करने के तौर तरीकों को और सियासी फैसलों को करीब से महसूस किया था। राजीव गांधी की राजनीतिक यात्रा शुरूआत से ही चर्चा में बनी रही, क्योंकि इनके प्रधानमंत्री का पद संभालते ही एक के बाद एक घोटालों की खबरें आने लगी। इतना ही नहीं मालदीव के तख्तापलट और श्रीलंका की मदद के​ लिए सैनिकों को भेजने के परिणाम स्वरूप उग्रवादी समुह लिट्टे (लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम) राजीव गांधी के खिलाफ हो गया। आखिरकार लिट्टे ने अपना बदला लिया और 1991 में राजीव गांधी की हत्या कर दी।

21 मई 1991 को काल के क्रूर हाथों ने राजीव गांधी जी को हम से छीन लिया था। नियति ने उन्हें बहुत कम समय दिया, लेकिन एक जननेता और प्रधानमंत्री के रूप में देश को विकासपथ पर ले जाकर राष्ट्रीय क्षितिज में उन्होंने भारत को जो पहचान व ऊंचाई दिलाई, वह इतिहास के पन्नों में एक स्वर्णिम अध्याय के रूप में अंकित है। उन्होंने भारत को आधुनिक, खुशहाल और एक मजबूत राष्ट्र बनाने में विशेष भूमिका निभाई। वह हमारे बीच नहीं है, मगर सभी को याद है कि किस तरह राजीव गांधी ने मर्मान्तक क्षणों में देश की बागडोर थामी थी। समूचा देश इंदिरा गांधी की हत्या को लेकर शोक में डूब हुआ था।

इन जटिल हालातों में भी बिना विचलित हुए राजीव ने चुनौतीपूर्ण दायित्व को बड़ी सूझबूझ के साथ संभाला था। राजीव गांधी भारत में सूचना प्रौद्योगिकी के प्रमुख सूत्रधार थे। राजीव का विश्वास था कि भारत का भविष्य विज्ञान और प्रौद्योगिकी में निहित है। उनकी सोच में उस उन्नतशील भारत की तस्वीर थी, जिसे सूचना प्रौद्योगिकी के द्वारा ही संवारा जा सकता था। आज भारत में चारों ओर जो कंप्यूटर क्रांति दिखाई दे रही है, वह राजीव की ही देन है। उन्हें भारत की युवा शक्ति पर इतना विश्वास था कि उन्होंने मताधिकार की पात्रता आयु 21 वर्ष से घटाकर 18 वर्ष कर दी।

उनका मानना था कि जब 18 वर्ष की आयु में युवा संपत्ति का अधिकारी हो जाता है तो मताधिकार से उसे वंचित रखना ठीक नहीं। एक तरह से यह एक बड़ा अवदान है राजीव का, युवा पीढ़ी के लिए। इस अधिकार की बदौलत लोकतंत्र में आज युवा महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं। राजीव ने महिला सशक्तिकरण की दिशा में अभूतपूर्व प्रयास किए। उन्होंने महिलाओं को अधिकार दिलाने की कई योजनाएं लागू कीं। पंचायतों एवं नगरीय निकायों में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था सुनिश्चित की।

सार्वजनिक जीवन में प्रवेश के बाद चूंकि उन्होंने देश के विभिन्न स्थानों, खासकर ग्रामीण इलाकों का अनवरत दौरा किया था, फलस्वरूप भारत के गांव, उन्हें भारत की आत्मा नजर आते थे। राजीव जी देश के दुर्गम इलाकों में निवासरत आदिवासियों के जीवन में खुशहाली लाना चाहते थे। वे बतौर प्रधानमंत्री सीधे गरीब की झोपड़ी तक पहुंचकर उससे प्रत्यक्ष मुलाकात करते थे। यह मामूली बात नहीं, बल्कि समाज के अंतिम छोर के व्यक्ति के प्रति राजीव की संवेदनशीलता थी। राजीव गांधी का ये भी मानना था कि किसान हमारे देश की रीढ़ हैं। खेती-किसानी की तरक्की के बिना देश की तरक्की संभव नहीं है।

राजीव गांधी एक सच्चे लोकतंत्रवादी थे, एक ऐसे व्यक्ति थे जो सदा नए विचारों और रचनात्मक आलोचनाओं का स्वागत करते थे। उनके मन में विपक्ष के नेताओं के प्रति भी सम्मान था और विपक्ष से उनके राजनीतिक मतभेद अवश्य थे लेकिन एक-दूसरे के प्रति उनके मन में समादर स्नेह का भाव था। एक सांसद, प्रधानमंत्री, कांग्रेस अध्यक्ष एवं नेता प्रतिपक्ष के रूप में उन्होंने जो भी भूमिका निभाई, सभी में अपनी कार्यकुशलता की अमिट छाप छोड़ी। सबकी सुनना और सबको साथ लेकर चलना राजीव के व्यक्तित्व की सबसे बड़ी विशेषता थी। वे आमजन की समस्याओं को बड़े ध्यान से सुनते थे और फिर सही दिशा निर्देश देकर उसको सुलझाने का काम करते थे, यही उनकी कार्यशैली थी।

शाहीन बनारसी एक युवा पत्रकार और लेखिका है

भारत रत्न राजीव गांधी की स्मृति बनाए रखना सिर्फ रस्म अदायगी नहीं, बल्कि उस सपने का भी सम्मान होगा, जो उन्होंने नवीन, सक्षम और समृद्ध भारत के लिए देखा था। राजीव गांधी की स्मृति को संजोए रखना, उनके उस सपने का सम्मान होगा जो उन्होंने नए भारत के नव-निर्माण के लिए देखा था। ऐसे युगपुरुष का यशस्वी जीवन, उनकी शहादत तथा उनकी अनगिनत स्मृतियां हमेशा देश के लिए प्रेरणादायक रहेंगी। राजीव गांधी के आदर्शों से प्रेरणा लेकर उनके सद्विचारों को देश के कोने-कोने तक पहुंचाना, उन्हें आत्मसात करना ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

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