साबिर हुसैन: जिनकी बाल कहानियों का आज भी नहीं कोई सानी

फारुख हुसैन
डेस्क: बाल कहानीकारों में कई नाम उभरे, मगर एक नाम साबिर हुसैन का कोई सानी नहीं रहा। एक ऐसे बाल कहानीकार जिनका तार्रुफ़ करवाना सूरज को रोशनी दिखाने के मानिंद है। उनका साहित्य से बहुत ही नजदीकी रिश्ता रहा है। उन्होंने बाल कहानीकार के रूप में जहां अपना वर्चस्व कायम किया था, तो प्रौढ़ कथाओं में भी उनका कोई सानी नहीं रहा। उन्हें उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान के साथ भारतेंदु पुरस्कार, चिल्ड्रन बुक फेस्टिवल के जैसे बड़े पुरस्कार से भी नवाजा़ गया। इसके साथ-साथ उन्होंने प्रसिद्ध वैज्ञानिक और देश के राष्ट्रपति डॉक्टर एपीजे अब्दुल कलाम से भी मुलाकात कर चंद घंटे गुजारे। जहां पर उन्होंने साहित्य से जुड़े अपने अनुभवों उनके साथ सांझा किया था।
उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले के पलिया निवासी बाल कहानीकार व कथाकार स्वर्गीय साबिर हुसैन का जन्म 10 जुलाई सन 1954 को जिले के ही मोहम्मदी कस्बे में हुआ था। बाद के दिनों में वह पलिया नगर पहुंचे जहां पर उन्होंने जीवन यापन करने के लिए एक प्रिंटिंग प्रेस पर कंपोजीटर के रूप में कार्य करना शुरू किया और उसके बाद उन्होंने अपनी खुद की एक कॉस्मेटिक की दुकान कर ली, जो की आजीवन रही। साबिर हुसैन को बचपन से ही कहानियां लिखना अच्छा लगता था। धीरे-धीरे यह शौक उनकी जिंदगी का हिस्सा बन गया और उनकी पहचान बाल कहानीकार के रूप में हुई।
उन्होंने सैकड़ों की संख्या में बाल कहानियों के साथ-साथ प्रौढ़ कथाएं, लघुकथा, छड़िकाएं, व्यंग्य, नाटक, गीत, छंद आदि लिखे। जो चर्चित पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए। साबिर हुसैन ने हिममानवों के देश में, पापा की खोज, पीली पृथ्वी, आजादी के दीवाने, जीतेंगे हम, जैसे चर्चित बाल उपन्यास लिखें। जिन्हें बच्चों के साथ-साथ बड़ों ने भी खूब पसंद किया। इसके अलावा धारावाहिक प्रकाशन में नूपुर नक्षत्र, भंवर संग्रह भी चर्चाओं में रहा, साथ ही आकाशवाणी से भी उनके कई बाल नाटक भी प्रसारित किए गए। उनकी रचनाएं कई भाषाओं में भी अनुवादित की गई।
साबिर हुसैन को बाल साहित्य में योगदान हेतु शकुंतला सिरोठिया बाल साहित्य पुरस्कार, नागरिक बाल साहित्य संस्थान द्वारा सम्मान, उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान के साथ भारतेंदु पुरस्कार, चिल्ड्रन बुक फेस्टिवल के पुरस्कार के साथ भारतीय बाल कल्याण कानपुर के साथ-साथ का अन्य सम्मानों से पुरस्कृत किया गया था। साबिर हुसैन जितने सरल स्वभाव के थे, उतनी ही सरल उनकी कहानियां होती थी। साबिर हुसैन की पूरी जिंदगी कठिनाइयों में भी गुजरी। लेकिन उन्होंने फिर भी हंसते हुए उसका सामना किया और लंबी बीमारी के बावजूद उन्होंने अपना लेखन लगातार जारी रखा।
स्व0 साबिर हुसैन की पत्नी श्रीमती सकीना बानो दो पुत्रियां सुरैया बानो, रुकैया बानो व उनके दो पुत्र फारूख हुसैन और आसिफ हुसैन है। वही फारूख हुसैन भी अपने पिता के नक्शे कदम पर चल रहे हैं। जिन्होंने अपने पिता की तरह ही साहित्य से जुड़े हैं और इस वक्त वह प्रिंट मीडिया के साथ-साथ इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में भी अपना वर्चस्व कायम कर चुके हैं। स्वर्गीय साबिर हुसैन लंबी बीमारी के चलते ही 65 वर्ष की उम्र 3 जुलाई सन 2013 में लखनऊ के एक अस्पताल में सुबह पांच बजे उन्होंने आखिरी सांस ली। परिजन उनकी पार्थिव देह पैतृक गांव ले गए, जहां उन्हें सुपुर्दे खाक किया गया। आज स्वर्गीय साबिर हुसैन नहीं रहे लेकिन उनका साहित्य आज भी अमर है और बड़े-बड़े साहित्यकारों की ज़ुबानी पर उनका साहित्य आज भी जिंदा है।